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समाज सुधारक Social reformer Raja Ram Mohan Roy समाज सुधारक राजा राममोहन राय

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Published on May 19, 2018

समाज सुधारक Social reformer Raja Ram Mohan Roy समाज सुधारक राजा राममोहन राय
https://www.srweb.in/राष्ट्रवाद-का-उद...
Raja Ram Mohan Roy को 'आधुनिक भारतीय समाज का जन्मदाता' कहा जाता है. वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे. धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है. राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंध विश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया.
राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को राधा नगर नामक बंगाल के एक गाँव में, पुराने विचारों से सम्पन्न बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उन्होंने अपने जीवन में अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, ग्रीक, हिब्रू आदि भाषाओं का अध्ययन किया था. हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सूफी धर्म का भी उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था.
युवावस्था में ही मूर्तिपूजा खंडन
ब्रह्मसमाज की स्थापना

राजा राममोहन राय आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे तथा उन्होंने गणित एवं विज्ञान पर अनेक लेख तथा पुस्तकें लिखीं. 1821 में उन्होंने 'यूनीटेरियन एसोसिएशन' की स्थापना की. हिन्दू समाज की कुरीतियों के घोर विरोधी होने के कारण 1828 में उन्होंने 'ब्रह्म समाज' नामक एक नये प्रकार के समाज की स्थापना की. 1814 में उन्होंने आत्मीय सभा को आरम्भ किया. 20 अगस्त, 1828 में उन्होंने ब्रह्मसमाज की स्थापना की. 1831 में एक विशेष कार्य के सम्बंध में दिल्ली के मुग़ल सम्राट के पक्ष का समर्थन करने के लिए इंग्लैंड गये. वे उसी कार्य में व्यस्त थे कि ब्रिस्टल में 27 सितंबर, 1833 को उनका देहान्त हो गया. उन्हें मुग़ल सम्राट की ओर से 'राजा' की उपाधि दी गयी. अपने सब कार्यों में राजा राममोहन राय को स्वदेश प्रेम, अशिक्षितों और निर्धनों के लिए अत्यधिक सहानुभूति की भावना थी.
हिन्दू कॉलेज की स्थापना में योगदान

वे अपने समय के सबसे बड़े प्राच्य भाषों के ज्ञाताओं में से एक थे. उनका विश्वास था कि भारत की प्रगति केवल उदार शिक्षा के द्वारा होगी, जिसमें पाश्चात्य विद्या तथा ज्ञान की सभी शाखाओं की शिक्षण व्यवस्था हो. उन्होंने ऐसे लोगों का पूर्ण समर्थन किया, जिन्होंने अंग्रेज़ी भाषा तथा पश्चिमी विज्ञान के अध्ययन का भारत में आरम्भ किया और वे अपने प्रयत्नों में सफल भी हुए. उन्होंने हिन्दू कॉलेज की स्थापना में सहायता दी. यह संस्था उन दिनों की सर्वाधिक आधुनिक संस्था थी.
धार्मिक सुधारक

राजा राममोहन राय एक धार्मिक सुधारक तथा सत्य के अन्वेषक थे. मुसलमान उन्हें मुसलमान समझते थे, ईसाई उन्हें ईसाई समझते थे, अद्वैतवादी उन्हें अद्वैतवाती मानते थे तथा हिन्दू उन्हें वेदान्ती स्वीकार करते थे. वे सब धर्मों की मौलिक सत्यता तथा एकता में विश्वास करते थे.
समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष

अंग्रेज़ ईसाई मिशनरी ने अंग्रेज़ी भाषा में 'फ्रेंड ऑफ़ इण्डिया' नामक एक पत्र जारी किया था. इसी वर्ष गंगाधर भट्टाचार्य ने 'बंगाल समाचार' का प्रकाशन शुरू किया. बंगाल में एक उदारवादी पत्र 'केलकटा जर्नल' जेम्स सिल्क बकिंधम ने अक्टूबर सन् 1818 में शुरू किया. सन् 1821 में ताराचंद्र दंत और भवानी चरण बंधोपाध्याय ने बंगाली भाषा में साप्ताहिक पत्र 'संवाद कौमुदी' निकाला, लेकिन दिसंबर 1821 में भवानी चरण ने संपादक पद से त्याग पत्र दे दिया, तो उसका भार राजा राममोहन राय ने संभाला. अप्रैल 1822 में राजा राममोहन राय ने फ़ारसी भाषा में एक साप्ताहिक अख़बार 'मिरात-उल-अख़बार' नाम से शुरू किया, जो भारत में पहला फ़ारसी अख़बार था
राजा राममोहन राय ने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी कड़ा संघर्ष किया था. उन्होंने स्वयं एक बंगाली पत्रिका 'सम्वाद-कौमुदी' आरम्भ की और उसका सम्पादन भी किया. यह पत्रिका भारतीयों द्वारा सम्पादित सबसे पुरानी पत्रिकाओं में से थी. उन्होंने 1833 के समाचारपत्र नियमों के विरुद्ध प्रबल आन्दोलन चलाया. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को एक स्मृति-पत्र दिया, जिसमें उन्होंने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लाभों पर अपने विचार प्रकट किए थे. समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन के द्वारा ही 1835 में समाचार पत्रों की अज़ादी के लिए मार्ग बना.
सती प्रथा हटाने को आन्दोलन

राजा राम मोहन राय के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी - सती प्रथा का निवारण. राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को मिटाने के लिए प्रयत्न किया. उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण लॉर्ड विलियम बैंण्टिक 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके.
राममोहन जी के राजनीतिक विचार बेकन, ह्यूम,बैंथम, ब्लैकस्टोन और मॉन्टेस्क्यू जैसे यूरोपीय दार्शनिकों से प्रभावित थे.
27 सितम्बर, 1833 में इंग्लैंड में राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई.
ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर के आरनोस वेल क़ब्रिस्तान में राजा राममोहन राय की समाधि है. अंग्रेज़ महिला 'कार्ला कॉन्ट्रैक्टर' ने इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया.

राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्मसमाज धीरे धीरे कई शाखाओं में बँट गया. महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 'आदि ब्रह्म समाज', श्री केशवचन्द्रसेन ने 'भारतीय ब्रह्मसमाज' की और उनके पश्चात् 'साधारण ब्रह्म समाज', की स्थापना हुई. ब्रह्मसमाज के विचारों के समान ही डॉक्टर आत्माराम पाण्डुरंग ने 1867 में महाराष्ट्र में 'प्रार्थना समाज' की स्थापना की जिसे आर जी भण्डारकर और महादेव गोविन्द रानाडे जैसे व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त हुआ. इस प्रकार ब्रह्मसमाज यद्यपि विभिन्न शाखाओं में विभक्त हो गया


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