Piyush Mishra - Gulaal
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@natrud8991 The original poem is by Ramdhari Singh 'Dinkar' called 'Rashmirathi'. Might want to check it out if inclined towards 'Vir ras'.
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@anytomdickandhary i am sure Mishra would agree with u as well
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दो न्याय अगर तो आधा दो, और उसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खाएँगे, परिजन पर असि न उठाएँगे। लेकिन दुर्योंधन वह भी दे न सका, आशीष समाज की ले न सका। उलट हरि को बाँधने चला। जो था असाध्य साधने चला।हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
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sale hai sale hai...
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apni bandukon ka istemaal kiya karo...
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Aag lagadi Mishra ji nai.
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Who is Dinkar...???
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दो न्याय अगर तो आधा दो, पर उसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम। हम वही खुशी से खाएँगे, परिजन पर असि न उठाएँगे। दुर्योंधन वह भी दे न सका, आशीष समाज की ले न सका। उलटा हरि को बाँधने चला। जो था असाध्य साधने चला।हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- 'जंजीर बढ़ा...
aslambhai123211 1 year ago 10
भगवान् कुपित होकर बोले - “जंजीर बढ़ा कर साध मुझे हां हां दुर्योंधन बाँध मुझे, ये देख गगन मुझ मे लय है, मुझे, ये देख पवन मुझ मे लय है, मुझ मे वलीन झंनकार सकल, मुझ मे लय है संसार सकल, सब जन्म मुझी से पाते हें फिर लौट मुझी मे आते हें, ये देख जगत का आदि अन्त ये देख महाभारत का रण, मृत्तकों से पटी पड़ी भू है, पहचान कहां इसमे तू है” ।
nicechamp 1 year ago 5