Hanuman Chalisa, Kakrighat, India September 2009 - Krishna Das
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tears in my eyes and sore throat
shree ram jaye ram jaia jaie ram
from belgium
hariji
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wolfgang koch was here.
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awesome
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दॊहा: (Starting Doha or verses) श्री गुरु चरन सरॊज रज निजमनु मुकुरु सुधारि । बरनऊ रघुबर बिमल जसु जॊ दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन ननु जानिकॆ सुमिरौ पवन कुमार । बल बुद्धि विद्या दॆहु मॊहि हरहु कलॆस बिकार् ॥ चौपाई: जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जय कपीश तिहु लॊक उजागर ॥ 1 ॥ रामदूत अतुलित बलधामा । अञ्जनि पुत्र पवनसुत नामा ॥ 2 ॥ महावीर विक्रम बजरङ्गी । कुमति निवार सुमति कॆ सङ्गी ॥3 ॥ कञ्चन वरण विराज सुवॆशा । कानन कुण्डल कुञ्चित कॆशा ॥ 4 ॥ हाथवज्र औ ध्वजा विराजै । कान्थॆ मूञ्ज जनॆऊ साजै ॥ 5॥
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शङ्कर सुवन कॆसरी नन्दन । तॆज प्रताप महाजग वन्दन ॥ 6 ॥ विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिवॆ कॊ आतुर ॥ 7 ॥ प्रभु चरित्र सुनिवॆ कॊ रसिया । रामलखन सीता मन बसिया ॥ 8॥ सूक्ष्म रूपधरि सियहिं दिखावा । विकट रूपधरि लङ्क जरावा ॥9॥ भीम रूपधरि असुर संहारॆ । रामचन्द्र कॆ काज संवारॆ ॥10॥ लाय सञ्जीवन लखन जियायॆ । श्री रघुवीर हरषि उर लायॆ ॥11॥ रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥12॥ सहस वदन तुम्हरॊ जास गावै । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावै ॥13॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥14॥
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जम(यम) कुबॆर दिगपाल जहां तॆ । कवि कॊविद कहि सकॆ कहां तॆ ॥ 15 ॥ तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥ 16 ॥ तुम्हरॊ मन्त्र विभीषण माना । लङ्कॆश्वर भऎ सब जग जाना ॥ 17 ॥ युग सहस्र यॊजन पर भानू । लील्यॊ ताहि मधुर फल जानू ॥ 18 ॥ प्रभु मुद्रिका मॆलि मुख माही । जलधि लाङ्घि गयॆ अचरज नाही ॥ 19 ॥ दुर्गम काज जगत कॆ जॆतॆ । सुगम अनुग्रह तुम्हरॆ तॆतॆ ॥ 20 ॥ राम दुआरॆ तुम रखवारॆ । हॊत न आज्ञा बिनु पैसारॆ ॥ 21 ॥ सब सुख लहै तुम्हारी शरणा । तुम रक्षक काहू कॊ डर ना ॥ 22 ॥
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राम रसायन तुम्हारॆ पासा । साद रहॊ रघुपति कॆ दासा ॥ 32 ॥ तुम्हरॆ भजन रामकॊ पावै । जनम जनम कॆ दुख बिसरावै ॥ 33 ॥ अन्त काल रघुवर पुरजाई । जहां जन्म हरिभक्त कहाई ॥ 34 ॥ और दॆवता चित्त न धरई । हनुमत सॆइ सर्व सुख करई ॥ 35 ॥ सङ्कट कटै मिटै सब पीरा । जॊ सुमिरै हनुमत बल वीरा ॥ 36 ॥ जै जै जै हनुमान गॊसाई । कृपा करॊ गुरुदॆव की नाई ॥ 37 ॥ जॊ शत वार पाठ कर कॊई । छूटहि बन्दि महा सुख हॊई ॥ 38 ॥ जॊ यह पडै हनुमान चालीसा । हॊय सिद्धि साखी गौरीशा ॥ 39 ॥ तुलसीदास सदा हरि चॆरा । कीजै नाथ हृदय मह डॆरा ॥ 40 ॥
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दॊहा: ( Finishing Doha or verses)
पवन तनय सङ्कट हरण – मङ्गल मूरति रूप् ।
राम लखन सीता सहित – हृदय बसहु सुरभूप् ॥
सियावर रामचन्द्रकी जय । पवनसुत हनुमानकी जय ।
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He is vocalizing all the beauty and majesty that exists in this world...which goes beyond any warnings of fire and brimstone...we must see the beauty that our Lord has created, whcih is manifested in his creatures, all humans and animals alike.
grizzy898 2 years ago 18
His words and music express the beauty and love in all of humanity, our lord God that has sanctified those who respect and love all of the earth and His creations.
grizzy898 2 years ago 14