पहाड़ू से बैर किले, गैरसैण गैर किले...!
पहाड़ मांगी राजधानी , देह्रादूने सैर किले !
किले भै किले, सोचा धौं किले , पूछा तों किले ...
पहाड़ू राज हर्ज किले, कुछ भयुं मर्च किले..!
गैरसैणा बांठों पैंसा, देहरादून खर्च किले ..!
किले भै किले , पूछा तों किले...
फैसला म् देर किले , सदनी ठैर ठैर किले,
राजधानी पहाड़ होली त् नेता जी थै डेर किले...!
किले भै किले , सोचा धौं किले, पूछा तों किले...
अंग्रेजी कि लैर किले, मातृभाषा गैर किले..
बिराणी संस्कृति भीतर, अपनी भैर-भैर किले..!
किले भै किले , सोचा धौं किले, पूछा तों किले...
विकास म् अबेर किले , सरकार लमडेर किले,
जनता कु अँधेरी रात , नेता कु सुबर किले,
किले भै किले , सोचा धौं किले, पूछा तों किले...
संगदा हेरफेर किले, भ्रष्टाचारी केर किले ,
ईमानदार गरीबी मा, बेइमान कुबेर किले ..!
किले भै किले, पूछा तों किले, सोचा धौं किले..
किले भै किले, किले भै किले........
(द्वारा लोकगायक एवं कवि श्री नरेंद्र सिंह नेगी)
उत्तराखंड के लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी उत्तराखंड के जन मानस और पहाड़ी सरोकारों पर लिखी ये कविता पहाड़ के आज की बदलती सामाजिक मान्यताओं और बदतर राजनीतिक हालातों का सटीक चित्रण है !
negi ji aapko sat sat naman................
sknautiyal 1 month ago
negi ji aap kumon garwal ke idal hai aap ek bar bolo to sahi dhusare din aap uttrakhand ke cm hange eshe log to chahiye jinhe uttrakhand ka dard ho pida ka ehasas ho ye to sab kamine hai aapke bad uttrakhand mai esa koi nahi hai jiske dil mai aapni janm bhumi ke liye itna dard dai dard muje bi hai orwo kobi hai ................................................................
kiran1234999ify 1 month ago