निकली भी न थी आह अभी मेरे जिगर से
सहमे हुए घबरा के निकल आये वो घर से
लिल्लाह हमें चश्मे इनायत से न देखो
हम कांपते रहते हैं मुहब्बत क़ी नजर से
तुम शौक से अब ज़ुल्म करो रहम के बदले
हम हाथ उठा बैठे दुआओं के असर से
आसीर ए मोहब्बत ने अजब रंग जी ढाया
अब वो भी परीशां है मेरे दर्द ए जिगर से
Lillah hamein chishm e inayat se na dkheko
hum kaanpte rehte hain mohabat ki nazar se.
Thanks for the best ever upload of another ghazal.
56riazali 5 months ago